कुछ अनुवाद जिन्होंने पूरी दुनिया ही बदल दी

Posted by Amna Singh on October 11, 2016

Madhu B. Joshi prefers to be known as a communication practitioner. She sees a great need for demystification in daily life and has been trying to work towards it. She has taught translation and a short, self-designed course of Indian Culture; mentored content teams of major education NGOs and designed educational audio-video programmes for CIET, NCERT. Joshi is a translator of Hindi poetry and short fiction in English and has presented major black feminist writers in Hindi. She is also a prolific and visionary collaborator of StoryWeaver. All of this, and we also know and love the other मधु बी. जोशी (in her own words)... जो खाना पकाना, इलाज करना, पौधे और कुत्ते पालना, राय देना.. जैसे बहुत से मुफ़्त काम करती हैं। उन्हें सब से ज़्यादा मज़ा बच्चों के लिए काम करने में आता है और वह इसका कोई मौका नहीं चूकतीं। 

Here, we re-present an article of hers that was carried in Hindustan on International Translation Day (30th Sept). In this article, she gives us historical evidence to emphasize the power of translations. She talks about how translations of key religious texts helped break religious barriers and induce world peace in the strife ridden political milieu of the 16th Century.

अनुवाद के धर्म के चेहरे को बदलने और उसे अधिक लोकोन्मुख और सर्वसुलभ बनाने के दो बड़े उदाहरण हैं रामायण और बाइबल के 16वीं सदी में आए संस्करण। इन ग्रंथों ने अपनी भाषा और युग को नए शब्द, नए मुहावरे और नई अवधारणाएं ही नहीं दीं, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया। कम से कम यूरोप में तो इन के बाद लेखन का तेवर पूरी तरह बदल गया। आज अगर धर्म पर सार्वजनिक बहस संभव है तो उसकी पीठिका इन्हीं अनुवादों ने तैयार की है।

बाइबल के शुरूआती जर्मन और अंग्रेज़ी अनुवाद करने वाले मार्टिन लूथर और विलियम टिंडेल हिब्रू-ग्रीक और लैटिन जैसी शास्त्रीय भाषाओं के अधिकारी विद्वान और धर्मशास्त्री थे (बाइबल के उनके अनुवाद इस ग्रंथ के हिब्रू-ग्रीक पाठों पर आधारित थे) तो रामायण का पुर्नपाठ करने वाले तुलसीदास संस्कृत के अधिकारी विद्वान और धर्मशास्त्री थे। लेकिन अपने युग और समाज के लिए, अभी तक अभिजातवर्ग तक सीमित रहे और ज्ञान के समानार्थक बन चुकेशास्त्रीय ग्रंथों को लोक के लिए सुलभ बनाने के लिए उन्होंने घर-गली-बाज़ार की भाषा को आधार बनाया। तुलसीदास ने काव्यरचना की तत्कालीन भाषा ब्रजभाषा के बजाय अपने क्षेत्र की लोकभाषा अवधी में रामचरितमानस लिखा। 

यह अनुवाद धर्मविरूद्ध माने गए। आखिर वह धर्मग्रंथों के एक वर्गविषेश द्वारा ही लिखे-पढ़े और व्याख्या किए जाने की परंपरा से ज़बर्दस्त विचलन थे। यूरोप में तो यह चर्च और उस के समर्थन से चल रही राजा की सत्ता को बड़ी चुनौती थे। मार्टिन लूथर का साथ उनके अनुयायियों ने तक छोड़ दिया, विलियम टिंडेल के अनुवाद की प्रतियां राजादेष पर जलाई गईं, खुद उन की हत्या की गई, तुलसीदास और रामचरितमानस काषी के विद्वतवर्ग का कोपभाजन बने रहे।

इन तीनों अनुवादों ने अभिजातवर्ग का विषेशाधिकार बन चुके शास्त्रीय ज्ञान को जनसाधारण के लिए सुलभ बना कर विषेशाधिकार और ज्ञान पर एकाधिकार को एक झटके में तोड़ दिया। दरअसल इस आंदोलन की शुरूआत पहले ही जर्मन बोलियों में लैटिन स्त्रोतों के अनुवाद और भारतीय बोलियों में भक्ति और ज्ञान के पदों की रचना से हो चुकी थी। इनमें से बहुत सी रचनाओं में विचार के स्तर पर शास्त्रीय धर्मग्रंथों की अनुगूंज सुनाई देती है लेकिन सच यह भी है कि इनके रचनाकार, कम से कम भारत में, ज़्यादातर परंपरागत शास्त्रीय ज्ञान से दूर रखे गए वर्गों से थे। यह सभी रचनाएं पुरोहित वर्ग के दान-दक्षिणा-प्रायश्चित-अनुष्ठान को मुक्ति का साधन बताने के विरूद्ध स्वर उठाते हुए मनुष्य के व्यक्तिगत कर्म को, मनुष्य के देवताओं को समर्पण के बरक्स मनुष्य के जीवमात्र के प्रति करूणाभाव को सर्वोच्च मान रही थीं जिससे पुरोहित की ज़रूरत और वैधता ही संदेह के दायरे में आ गई। जीवमात्र के प्रति करूणाभाव कोई नई अवधारणा नहीं थी। ईसाई संत फ्रांसिस और बुद्ध ने करूणा का उपदेश बहुत पहले दिया ही था लेकिन पुरोहितवर्ग ने उसे ईश्वर और ईसा का विषेश लक्षण बना दिया था। 

यूरोप में बाइबल के अनुवादों को यूरोप की राजसत्ताओं पर रोमन कैथॅलिक चर्च की कड़ी जकड़ को तोड़ने वाली घटना माना जाता है जिसने आखिर अरब, ईसाई और मुसलमान सेनाओं के बीच चलनेवाले धर्मयुद्धों को लगभग खत्म कर दिया। रामचरितमानस और भक्ति काव्य ने हिंदू धर्म के आधार, चतुर्वर्ण की अवधारणा पर पुनर्विचार किए जाने की ज़रूरत को रेखांकित किया और यह क्रम अब भी जारी है।
 

Read Madhu B Joshi's happy translations on StoryWeaver here. One World, that's the eternal dream! 



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