Madhu B. Joshi prefers to be known as a communication practitioner. She sees a great need for demystification in daily life and has been trying to work towards it. She has taught translation and a short, self-designed course of Indian culture, mentored content teams of major education NGOs and designed educational audio-video programmes for CIET and NCERT. Joshi is a translator of Hindi poetry and short fiction in English and has presented major black feminist writers in Hindi. She is also a prolific and visionary collaborator of StoryWeaver, and has translated many storybooks into Hindi including मुझे खोज कर दिखाओ! and बाग की सैरYou can read all her stories on StoryWeaver here.

Apart from all of the above, we also know and love the other मधु बी. जोशी (in her own words)... जो खाना पकाना, इलाज करना, पौधे और कुत्ते पालना, राय देना.. जैसे बहुत से मुफ़्त काम करती हैं। उन्हें सब से ज़्यादा मज़ा बच्चों के लिए काम करने में आता है और वह इसका कोई मौका नहीं चूकतीं। 

In this blog post, Joshi writes about the complexity of translation and the many challenges it presents.

Stories translated into Hindi by Madhu B. Joshi on StoryWeaver.

स्टोरीवीवर की कहानियों का अनुवाद हमेशा चुनौती साथ लाता हैः हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं होता कि कहानी का पाठक दुनिया के किस हिस्से में है, उसकी आयु या शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या है, वह प्रस्तुत पाठ को किस उद्देश्य से पढ़ रही है, क्या हमारे शब्द उसके लिए भी वही अर्थ रखते हैं, क्या हमारा किया अर्थान्वय उसके लिए भी कारगर रहेगा?.....अनेक प्रश्न बार-बार कलम रोकते हैं। और फिर लेखक के मूल कथ्य और मंतव्य को पकड़ने की चुनौती तो हमेशा ही अनुवादकों के सामने रहती है-अरे मन संम्हल-सम्हल पग धरिये! 

एक मोटा-मोटा सूत्र राह दिखाता हैः अनूदित सामग्री पढ़नेवाले पाठक के लिए वही मूल रचना है। लेकिन नामों और रिश्तों का जटिल संसार कभी-कभी बहुत कड़ी परीक्षा लेता है। एक कहानी में दक्षिण भारतीय मुख्य चरित्र, जो एक लड़का था, का नाम सत्या था, हिंदी मे यह लड़कियों का नाम होता है; तो नामों के मूल रूप बनाए रखने की ताकीद के बावजूद मैंने उसका नाम सत्य कर दिया क्योंकि मुझे हिंदी के पाठकों को भ्रम में न डालना ज़्यादा महत्वपूर्ण लगा। हाल ही में गोआनी मूल के ईसाई लेखक की लिखी सुंदर और बहुत रोचक कविता-कहानी में शवयात्रा के समय बजनेवाले बैंड (भारत में कम ही जगह इस तरह का चलन है) का उल्लेख आया। इसे हिंदी के बाल-पाठक को समझाने के लिए हमें लंबी-चैड़ी टिप्पणी देनी पड़ती जो पढ़ने का मज़ा ही किरकिरा कर देती। तो हल निकाला शवयात्रा का उल्लेख गोल करके; पाठ की रोचकता बरकार रही, उस की गुणवत्ता हल्की नहीं हुई।

लेकिन कई बार तकनीकी शब्दावली की यांत्रिकता आड़े आती हैः प्रचलित शब्द गोल/गोला से पता नहीं चलता कि वह किसी पिंड का संकेत दे रहा है या द्विआयामी आकृति काः गेंद भी गोल है, और नंगी आंख से धरती से दिखता चांद भी! अब अगर हम सायकिल के पिंडाकार पहियों की बात कहना चाहें तो कैसे कहेंगे? एक और बड़ी समस्या पशु-पक्षियों-कीट-पतंगों-वनस्पतियों के नाम हिंदी में बताते हुए आती है। इस संदर्भ में ‘ताल का जादू’ के हिंदी अनुवाद की याद आती है। इसमें उल्लिखित कई पक्षियों और कीटों के नाम मुझे नहीं पता थे। हमारी प्रचलित शब्दावली में, कई कारणों से इन में से बहुत के नाम उपलब्ध नहीं हैं; किसी वैज्ञानिक शब्दावली में मिल भी जाएं तो शेर-बाघ-तेंदुए के बीच अंतर न जानने वाले हमारे पाठकों के लिए वे इतने अपरिचित होते हैं कि अंग्रेज़ी नाम देना भी ठीक ही लगता है-जैगुआर कहने पर यह संभावना बनी रहेगी कि कोई जानकार उसे इसका अर्थ समझा सकता है (वैसे जैगुआर अमेरिका में पाए जाने वाले तेंदुए हैं)। बेसिल का अर्थ आमतौर पर तुलसी लगाया जाता है लेकिन तुलसियां भी कम से कम छः तरह की होती हैं, बेसिल में यह तथ्य निहित है, तुलसी में नहीं। 

हर नया पाठ अनुवादक के लिए नई चुनौती लाता है। हर नया अनुवाद भाषा के क्षितिज को कुछ आगे सरकाता है।


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