StoryWeaver Visits Hyderabad!

Posted by Sherein Bansal on June 08, 2017

My first StoryWeaver workshop took me to Hyderabad. I was officially on the training side of the workshop, but since this was my first, I experienced those two days with two different batches as a participant too.

50+ educators, resource people, librarians and program managers from 12 different organisations and schools poured into the room and were brimming with energy even before the workshop began. Payoshni, Senior Outreach Manager and trainer for the workshop, talked about StoryWeaver - our open repository of free children’s books, its practical uses in a classroom, and the way it can be used to enhance a child’s world from all aspects like cognitive approach, social skills, comprehension, logical thinking and aesthetics.  


Teachers became curious students and asked us countless questions that spanned across queries about our features, to the efficacy of the platform itself. It was a delight to see them realize the applications of StoryWeaver in the classroom. Once they understood the intricacies of creating, translating or releveling (simplifying or making a story complex) stories on the platform, all of them were eager to try their hand at bringing about their own creation on StoryWeaver.

Sandhya Damodar, Pudami Schools, Hyderabad talks here about the various applications of StoryWeaver in a classroom and specifically the advantages of being able to ‘relevel’ stories: 



The fact that the stories on StoryWeaver are free to use, read, download and print was exciting and important for teachers who came from schools based in rural settings. Active discussions ranged from how to preserve the accuracy and sanctity of a language through translations. Concerns unfolded about how some languages need more original content for the children, and one way could be to create and translate in that language on platforms like StoryWeaver.

In this short video, workshop participant Shadab Ahmad, Focus High School, Hyderabad talks about how StoryWeaver will help him in getting Urdu stories across to his students and also about the ease of publishing good stories on the platform.



The childlike joy of the teachers working in teams with fellow educators whom they didn’t know previously, and raising their hands to read their created stories out loud was infectious. They proudly presented their work in front of everyone and laughed along with everyone at the bits they got wrong or where they themselves had added humor! Some of them are still active on the platform and creating/translating/releveling stories for their students, for fun, or to contribute in some way to their favorite language.

As we wrapped up the two-day workshop, it was a comfort to know there are educators who are eager to learn about how to improve a child’s experience in classrooms. And not just that, they want to do it through the art of stories.

Here are a few pictures from the event!

A big thank you to Dr.Reddy’s Foundation who made this wonderful workshop possible and all their efforts in bringing the best opportunities to their children. If you are interested in hosting a similar workshop for your organisation, drop us an email on storyweaver@prathambooks.org.

 

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Spotting Books That Encourage Children to Sharpen Their Eyes

Posted by Yamini Vijayan on October 28, 2016

Spotting books are a great way for children to engage with the book actively and for the reading experience to be an immersive one. It encourages them to explore the illustrations, and also make connections between words and images. We’ve been looking at a range of spotting books and it’s fascinating to see the different ways in which spotting has been made appealing to children. Here are a few books and illustrations that caught our attention!

How many animals and birds can you spot in this illustration by Vinayak Varma from 'Jadav and the Tree-Place'?

Scholastic has a range of spotting books ('I Spy' series). You can see their entire collection here.

Usborne has a collection of really amazing spotting books too: from bugs and butterflies, to adventures under the sea and in the night sky. In these, there are MANY things to spot. Here is an example.

Then there are the really clever ones, like Delphine Chedru’s ‘Spot It!: Find the Hidden Creatures’ and ‘The Odd One Out’ by Britta Teckentrup. In these, there are fewer things to spot but what makes it compelling is the imaginative manner in which the objects or creatures are hidden. It even works as pattern recognition.

Closer home, there are wonderful books by renowned author-illustrator Manjula Padmanabhan which have been published by Tulika. Take a peek at ‘I Am Different!’ and ‘We Are Different!’. Manjula Padmanabhan has also created wordless books for National Book Trust, which are bursting with interesting details because of which they also work as fantastic spotting books. Here's 'A Visit to the City Market' which was published by NBT in 1986.

One of our absolute favourite illustrations from Pratham Books titles' ('City of Stories') is this incredible illustration by the late Bindia Thapar. So much scope for spotting in this, right?

Hope this has inspired you and given you more amazing ideas for Spotathon! For more Spotathon details related to image size, how to submit your entries and the children we work with, click here.

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Rajesh Khar, Editor (Pratham Books), writes about the journey of a special set of books created last year. 

उत्तरप्रदेश के एक गाँव में एक स्कूल में बहुत सारे बच्चे एक कहानी बुनने में मग्न थे। वे कई सारे रंग बिरंगे चित्रों के इर्दगिर्द बैठे थे और इस कदर व्यस्त थे कि उन्हें शिक्षिका के कक्षा में होने का आभास भी नहीं हो रहा था। आखिरकार कुछ देर बाद एक बच्ची ने अपनी कहानी बुन ही ली और ख़ुशी से उछलने लगी। थोड़ी देर में एक एक करके बाकी सब ने भी अपनी कहानियाँ बना लीं। अब शिक्षिका का ध्यान आया और सब के सब उनकी और दौड़े। दीदी की आँखें चमक उठीं। इतने सारे बच्चों ने इतनी सारी कहानियाँ जो बुन ली थीं। उनको बड़ा अच्छा लग रहा था कि कहाँ तो ये बच्चे लिखने के नाम परकतराते थे और दो-चार लाईनें लिख कर हाथ खड़े देते थे, वहीं आज बिना किसी चूं चां के उन्होंने कहानी लिख ली थी। दीदी ने वो सारी कहानियाँ पढ़ीं, उनमें गलतियाँ तो थीं और कुछ में तो वाक्यों के बीच विराम चिन्ह भी नहीं थे लेकिन ये सभी कहानियाँ उन बच्चों की अपनी कहानियाँ थीं। सब के अपने शब्द, अपने वाक्य, अपने अनुभव और अपने संसार थे। पहली बार इसका अहसास हुआ था उन सब को।

यह एक स्कूल की कहानी नहीं थी, कई राज्यों के बहुत सारे स्कूलों के बच्चे पहली बार अपनी मनपसंद चित्रों पर अपनी कहानियाँ लिख रहे थे और इतनी सारी नयी कहानियाँ बुनी जा रही थीं। इन हज़ारों बच्चों के शिक्षक ख़ुश हो रहे थे और दूर दिल्ली में बैठे हुए कुछ लोग जिन्होंने बड़ी मेहनत करके सिर्फ़ थोड़े ही समय में ५५ नयी किताबें तैयार की थीं, उन्हें स्कूलों तक पहुँचाया था और टीचर्स को प्रशिक्षित भी किया था।

अप्रैल २०१५ के पहले सप्ताह में प्रथम के दिल्ली वाले दफ़्तर में रुक्मिणी बैनर्जी के कमरे में उनके कुछ सहकर्मी और प्रथम बुक्स के कुछ कर्मी आपस में गहन विचार कर रहे थे कि अब की बार बच्चों को कैसी नयी पुस्तकें दी जाएं ताकि उनके पढ़ने-लिखने का शुरुआती सफ़र आसान और मज़ेदार हो पाए। प्रथम ने बहुत सालों बाद फिर से पुस्तकालयों को सुदृढ़ बनाने की सोची थी। रुक्मिणी चाहती थीं कि नया सत्र शुरू होने तक बच्चों के पास पढ़ने को और उन्हें शब्दों की और आकर्षित करने को कुछ अच्छी सामग्री पहुँच जाये। उन्होंने ही इस चक्र को गति दी और फिर उनके कहने पर न केवल प्रथम के लोग बल्कि प्रथम बुक्स के संपादक समूह के लोग एक जुट होकर उन किताबों को तैयार करने लग गए। कैसी किताबें? उनमें क्या होगा और किस प्रकार की होंगी यह सब तो तय ही हो रहा था। केवल इतना तय था की कम से कम ५० और हिन्दी भाषा में होंगी।

प्रथम बुक्स में मनीषा चौधरी और उनके सहकर्मी जुट गए अलग अलग प्रकार की कहानियाँ तय करने में और उन सब को ऐसे प्रारूपों में ढालने में कि बच्चों को पसंद भी आएं और उनको पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया की ओर प्रेरित भी कर सके। पूरे अप्रैल और मई के महीनों में किताबें बनाने की प्रक्रिया चलती रही। प्रथम बुक्स ने कुछ ही समय पहले अपने नए नवेले स्टोरीवीवर प्लेटफार्म पर चित्रकारों के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की थी जिसमें ६५ से ज़्यादा चित्रकारों ने सिर्फ़ ६ चित्रों में अपनी अपनी कहानी भेजी थी। मनीषा और उनकी टीम को बिना शब्दों वाली पुस्तकें तैयार करने की सामग्री मिल गयी थी। उन्होंने २० ऐसे प्रारूप तैयार किये और साथ ही साथ ओडिशा की ४ जनजातीय भाषाओँ में तैयार की गयी किताबों में से भी कुछ को चुना गया। प्रथम समूह के साथ अनगिनत बैठकों में तैयार सामग्री पर चर्चा होती रही और फिर आख़िरकार एक एक करके किताबें चुनी जाने लगीं। फिर शुरू हुआ उनको डिज़ाइन करके हर तरह से प्रकाशन के योग्य बनाने का काम। यूँ तो इस काम के सभी चरणों को पार करने में कई  समय लग जाता है पर इस बार तो समय जैसे था ही नहीं। कड़ी मेहनत से सब ने मिलकर सभी किताबों को तैयार किया, उनको छपने भेजा और जून से पुस्तकें छप कर आनी शुरू हो गईं।

फिर शुरू हुआ उन्हें १० हज़ार से ज़्यादा स्कूलों तक किताबें उनकी ज़रुरत और बच्चों के पठन स्तर के अनुसार और प्रथम के कार्यक्रम के अनुसार! इतनी जगहों तक किताबें भेजने का काम बहुत बड़ा था और वेयरहाउस के लोगों ने दिन रात लगा कर लगभग एक महीने में किताबें वहाँ वहाँ पहुंचाईं जहाँ उनको पहुँचना था।

छुट्टियों से लौटे बच्चों को इतना बढ़िया तोहफ़ा मिलेगा, उनको उम्मीद भी नहीं थी। उनके शिक्षकों में से कुछ को और प्रथमके अपने लोगों को उन सब किताबों और कार्डों को बच्चों के साथ प्रयोग का प्रशिक्षण भी मिल चूका था। सब कुछ युद्ध स्तरपर किया गया था। तो क्या आश्चर्य की बात थी कि सभी इतने खुश थे! बच्चों ने उनका क्या इस्तेमाल किया और किस तरह इस सामग्री का असर पढ़ने-लिखने में हो रहा था, इस सबका अध्ययन भी किया जा रहा है। प्रथम की टीमें धीरे धीरे इस कार्यक्रम सभी पहलुओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

स्कूलों में शिक्षक मज़े से बच्चों द्वारा लिखे, कहे जाने वाले अफ़सानों को पढ़-सुन कर ख़ुश हैं, लेकिन अभी भी इस नयी पठन सामग्री का क्या क्या असर हो रहा है, उसे समझने, परखने में समय लगेगा। उससे पहले ही प्रथम और प्रथम बुक्स एक और नया सेट तैयार करना चाहते हैं...देखिये क्या क्या तैयार होगा

जब बच्चों की कलम चली तो फिर चलती रही ! उत्तरप्रदेश के जैतपुर, प्रतिष्ठानपुर के प्राथमिक विद्यालयों की कक्षा २ व् ३ की छात्राओं की कहानियों की एक छवि।

(This post first appeared on the Pratham Books blog, here.)

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